कमल विहार योजना से हजारो फर्जीवाड़े के शिकार
रायपुर CG4भड़ास. कॉम.आखिर कार कमल विहार योजना पर सरकार ने चूपी साध ली और मंत्री समेत अन्य सभी के मुह बंद करा गतिरोध में भी विराम लगा दिया पर अब कमल विहार से ठगे लोगो की सूची लम्बी होती नजर आ रही है देखना यह है की अब सरकार की बहुप्रतिक्स्त योजना कमल विहार में सरकार और तंत्र आम जनता को कैसे राहत पहुचता है या पहुचाता भी है या उन्हें खुद से निपटने की सलाह दे वैसे ही छोड़ दिया जाता है. कमल विहार योजना की पड़ताल में ऐसे हजारों केस सामने आ रहे हैं, जिनको भूमाफिया ने फंसा दिया। खेतों में बिना मास्टर प्लान एप्रूव कराए कुछ लोगों ने सैकड़ों की संख्या में भूखंड काट दिए। रजिस्ट्री हो गई, तो लोगों को लगा कि कालोनी का प्लान मंजूर है। कमल विहार के लिए जब रायपुर विकास प्राधिकरण और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग ने भूखंडों की पड़ताल कर लोगों को नोटिस भेजना शुरू की, तब यह सच्चाई लोगों के सामने आई। आरडीए का कहना है कि वह इस फर्जीवाड़े में कुछ नहीं कर सकता।
अगर भूखंड मालिकों को आपत्ति है, तो अवैध प्लॉट बेचने वाले के खिलाफ थाने में एफआईआर करवा सकते हैं। कल भास्कर दफ्तर में आए आरडीए अध्यक्ष एसएस बजाज के सामने भी ऐसे कई केस आए। जिला प्रशासन से मिले रिकार्ड के आधार पर आरडीए का दावा है कि कमल विहार में शामिल की गई 80 फीसदी से ज्यादा जमीन बिक चुकी है। इस पर खेती नहीं हो रही। ज्यादातर केस में निवेशकों ने खेतों को काटकर प्लॉट की शक्ल में बेच दिया है। ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं था कि उनको बेचे गए प्लॉट अवैध हैं। इन प्लॉटों पर मकान का न तो नक्शा पास होगा, न ही उनको बैंक से लोन मिलेगा। डेढ़ से दो हजार रुपए महीने की किस्त या सस्ते में मिले इन भूखंडों को लोगों ने निवेश के लिहाज से खरीद लिया। इसमें तीन सौ से ज्यादा लोगों की जमीन तो मास्टर प्लान के ग्रीन बेल्ट में आ रही थी। रायपुर विकास प्राधिकरण का दावा है कि कमल विहार योजना में ऐसे सभी लोगों को वैध प्लाट मिलने का रास्ता साफ हो जाएगा।यह योजना का सबसे बड़ा लाभ है। रेलवे से रिटायर हुए बीके प्रसाद ने कुछ साल पहले देवपुरी में अपने बेटे मनोज प्रसाद और श्रीमती पूनम के नाम पर दो 21 सौ -21 सौ वर्ग फीट के दो भूखंड खरीदे थे। केपीएस स्कूली के पास सड़क पर मिली जमीन के लिए उन्होंने कॉलोनाइजर को बाकी लोगों से ज्यादा पैसा दिया था। कमल विहार में जमीन के बदल छोटा भूखंड मिलने की शिकायत लेकर आरडीए अध्यक्ष एसएस बजाज के पास पहुंचे प्रसाद को पता चला कि जिस प्लॉट पर वह मकान बनाने की तैयारी कर रहे थे, वह अवैध है।
टाउन प्लानिंग से उसकी अनुमति ही नहीं ली गई है। इस पर न तो वह मकान बना सकते हैं, न ही उनको बैंक से कर्जा मिलेगा। हक्के-बक्के रह गए प्रसाद के मुंह से बोल नहीं फूट रहे थे। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि उनके साथ ऐसा धोखा हो जाएगा। आरडीए का कहना है कि अगर प्रसाद चाहें तो प्लॉट बेचने वाले व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर करवा सकते हैं।
केएल वर्मा ने ग्राम डूंडा के पास चार साल पहले किस्तों में 1200 वर्ग फीट का एक भूखंड लिया था। उन्होंने स्वीकार किया कि उनको अब तक पता नहीं है कि वास्तव में उनका प्लॉट है कहां। कॉलोनाइजर पर भरोसा करके उन्होंने प्लॉट ले लिया। कमल विहार योजना में उनका भूखंड भी शामिल कर लिया गया है। उनको 645 वर्ग फीट जमीन दी जा रही है, जो परिवार के रहने के लिहाज से उनको बहुत कम लग रही है। सुनील मिश्रा ने बताया कि 5 साल पहले मंथली स्कीम में 2400 वर्गफीट का प्लॉट खरीदा था। हर महीने डेढ़ हजार रुपए देकर उन्होंने जमीन ली थी। जमीन की रजिस्ट्री कारोबारी ने उनके नाम से कर डाली।
रजिस्ट्री के पहले जमीन की सर्च रिपोर्ट भी बनवाई गई। रजिस्ट्री के पहले पूरे ऐहतियात बरते गए। बस इतना ही नहीं पता कर सके कि जमीन का ले आउट पास है कि नहीं। जमीन जब कमल विहार स्कीम में फंसी तब पता चल रहा है कि प्लॉट अवैध है।
मासिक स्कीम में फंसे छोटे भूखंड स्वामी
कमल विहार के करीब तीन हजार छोटे प्लाटधारकों में से 75 फीसदी से अधिक लोगों ने मंथली स्कीम के तहत ही जमीन ली है। लेकिन जिन लोगों ने इन्हें जमीन बेची। उन्होंने टाउन एंड कंट्री प्लानिंग से ले आउट प्लान बिना पास कराए जमीन बेच दी। यह पूरे तथ्य परत दर परत कमल विहार योजना के बाद खुल रहे हैं। आरडीए के अधिकारियों का कहना है कि इसमें सबसे अधिक फायदा उन अवैध प्लॉटिंग करने वाले कुछ लोगों को हो रहा है, जिन्होंने जमीन के कुछ टुकड़ों की अवैध प्लॉटिंग करके बेच दिया। इसके बाद भी कुछ जमीन उनके पास बची हुई है। प्लॉटिंग का कारोबार करने वाले बची हुई जमीन को योजना में शामिल कर अपनी अवैध प्रापर्टी को भी वैध बना ले रहे हैं। साथ ही अवैध प्लॉटिंग कर नौकरीपेशा लोगों की जीवन भर की गाढ़ी कमाई भी डकार गए।
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