रविवार, मई 20, 2012
   
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चीखें खामोश भी नहीं हो पाईं थीं.. धनकुबेरों ने आनंदोत्सव मनाया

                   दंतेवाड़ा के गांव चिंतलनार की चीखें खामोश भी नहीं हो पाईं थीं, ताडमेटला की धरती में हमारे जांबाज शहीदों का लहू अभी जज्ब भी नहीं हो पाया था, रायगढ और जशपुर के सुदूर ग्रामीण अंचलों में शहीद सपूतों की चिता के फूल भी अभी चुने नहीं गए थे कि राजधानी रायपुर के बर्बर और अय्याश धनकुबेरों ने आनंदोत्सव मनाना शुरू कर दिया.

10 अप्रैल की शाम आधीरात तक अंजाम दिए गए एक कारनामे के बाजारू, संवेदनाहीन आयोजकों की बेशर्मी को नजरअंदाज कर देने के बाद भी राज्य शासन के मंत्रियों, विधायकों, पुलिस प्रशासन के आला अफसरों और विभिन्न आयोगो, मंडलों के अध्यक्षों के अलावा जिला कलेक्टर की सपरिवार जगजीतसिंह की शामे-ग़ज़ल में मौजूदगियां, खुशी से झूम-झूम उठना वहां मौजूद कम रहमदिल समझे जाने वाले लोगों की भी पलकें भिगो रहा था. कुछ पत्रकार मित्रों के साथ ही लेखिका को जबरदस्त झटका लगा जब म.बा.वि.वि मंत्री सुश्री लता उसेंडी की दिलफरेब मुस्कुराहटों के साथ जोरदार तालियों से दाद देने पर एक पत्रकार द्वारा ये याद दिलाए जाने पर कि 76 जवानों की लाशों का बोझा ढोते राज्य में यह उत्सव और आपकी मौजूदगी......?

पर उनका जवाब "मेरे 1 घंटे की मौजूदगी को आप गलत समझ रहे हैं हमें भी उन जवानों की मौत का दुख है" जबकि मंत्री महोदया कुछ सेकेंड पहले ही उनकी पसंदीदा गजलों पे पूछे गए सवालों पर पूरी प्रफुल्लता से अपनी शारीरिक भाषा (बाडी लेंग्वेज) सहित जगजीत सिंह की गाई सभी गजलों को अपनी पसंदीदा गजलों का बखान कर चुकी थीं. अपनी मौजूदगी को वाजिब करार देते हुए उन्होंने उस पत्रकार की मंशा को ही गैरवाजिब करार देते हुए उसे झिड़क दिया. काश...के इतने पे ही बस हो जाता. ..मंच से सटकर खड़ी बगैर नंबरप्लेट की वह गाड़ी जो चुनिंदा मंत्रियों और पुलिस के आला अफसरों की सुरक्षा के लिए (नक्सली सफाया अभियान के तहत) केंद्र सरकार द्वारा खैरात में दी गई है पर नजर पड़ते ही हम भौचक्क रह गए (कहीं सरकारी आयोजन में तो नहीं घुस आए?)  मगर वायरलैस और पिस्टलों से सुसज्जित अधिकारियों का एक पार्टी विशेष के नेता, मंत्रियों के बुढ़ा गए रिश्तेदारों (जिनके पांव कब्रों में लटके पड़े हैं) कमर और बांहों से लपेट सहारा देते, सोफे में बिराजमान करवाना, पंडरी थाना के अफसर का पंडाल की अगली पंक्ति में बैठक व्यवस्था का संचालन और अपने राजनैतिक आकाओं के जन बच्चों की तीमारदारी के लिए बिछ-बिछ जाना शको-शुब्हा की हर गुंजाइश को खत्म किए देता है और मामला कुछ-कुछ समझ में आने लगता है.

6 अप्रैल को नक्सलियों की बर्बर बुजदिली का शिकार हुए सीआरपीएफ के जवानों को श्रद्धांजलि/आखिरी सलामी देने के नाम पे सत्ताधारी और विपक्षी पार्टी के गुर्गों ने जो नौटंकी दिखाई (जो अबतक जारी है) वो राजधानी के इस कल्पवृक्ष रिसोर्ट में बेपर्दा नजर आ रही थी. सानिया-शोएब की निहायत निजी फैसले को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने वाले, मशाल रैलियों की अगुवाई करने वाले इस आनंदोत्सव में नशे में चूर खुशी से झूमते नजर आ रहे थे. जबकि इसी दिन दोपहर इन्होंने अपने परिवार (भाजपा) के वर्तमान विधायक रविशंकर त्रिपाठी की सड़क हादसे में दर्दनाक मौत के बाद चिता जलाई थी। मु.मंत्री, राज्यपाल भले ही यहां नजर नहीं आए मगर उनकी गाड़ियां (0107,5300) उनके परिवारों के साथ उत्सव में शामिल रहीं. जब पार्टी के आलाकमान भी स्विफ्ट जैसी शानदार गाड़ियों में इस आनंदोत्सव का लुत्फ उठाने पहूंचे हों तब बेचारे छुटभैय्यों का गुनाह ज्यादा बड़ा कैसे कहा जा सकता है.

हमेशा उड़ते रहने वाले मंत्रियों और मुख्यमंत्री को इतनी सुध भी नहीं आ सकी या किसी ने सलाह भी नहीं दी कि वे अपनी उडन खटोला से इन शहीदों को उनके परिजनों तक पहूंचवा देते. 8 से 12 घंटों में छग के शहीदों की लाशों के लिए अपना उड़न खटोला मयस्सर न कराने वाले मुख्यमंत्री फिर किस मुंह से शहीदों के सम्मान का दावा कर रहे हैं.

गौरतलब है कि पदमभूषण प्राप्त जगजीत सिंह ने 6 अप्रेल की घटना के बाद इतनी जल्दी छ.ग. में प्रोग्राम देने आने से मना कर दिया था. लेकिन राज्य के एक कददावर मंत्री की समझाईश व सुरक्षा की गारंटी लेने के बाद ही जगजीत सिंह इस आयोजन में शिरकत करने पहुंचे थे. छत्तीसगढ सरकार की संवेदनशीलता और आम गरीबों के गम में सराबोर रहने का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश की सबसे बड़ी नक्सली वारदात में सीआरपीएफ के 76 जवानों की शहादत के सम्मान में एक दिन के राजकीय शोक का ऐलान भी नहीं कर सकी. जबकि ये जवान छत्तीसगढ वासि़यों की जानोमाल की हिफाजत के लिए अपनी शहादत देते हैं जिनका ताल्लुक देश के लगभग दर्जनभर राज्यों से हैं. और तो और वे घायल जवान जो अस्पतालों में अपना इलाज करवा रहे हैं उनके परिजनों जो दूरदराज से टीवी और अखबारों में देख, पढ़, सुनकर अपने सपूतों की तीमारदारी करने राज्य में पहुंच रहे हैं उनकी खैर खबर लेने वाला या उनके लिए परदेश की इस भीषण गर्मी में राहत का इंतेजाम करने वाली कोई योजना या कार्यनीति या इंसानियत भी इस सरकार के पास नहीं हैं. कुछ लोगों को एक विशेष जात धर्म और भाषा भाषी होने के कारण शहर के नागरिक आसरा दे रहे हैं. पुलिस विभाग, विभागीय मंत्री, सरकार सम्मान समारोहों, उदद्याटन व शिलान्यास समारोहों में अति व्यस्त हैं जो बच गए हैं वे पूर्व निर्धारित आनंदोत्सवों में ऐश कर रहे हैं. आयोजकों में से किसी एक के भी किसी प्रियजन की मौत पे भी क्या ये कार्यक्रम निर्धारित समय पे हो पाता ?

सरहद पे जान देने वालों की कीमत क्या है ये नेताओं और सरकारों की मात्र 24 घंटों की दिनचर्या को देख कर ही अंदाजा लगाया जा सकता है. जो जवान शहीद हुए हैं वे किसी धनकुबेरों की औलादें नहीं हैं जशपुर जिले के शहीद लेयोस खेस बेहद गरीब परिवार से हैं उनके घर की दीवार पे 2रु. किलो चावल का सरकारी कर्मचारी के हाथों लिखा बोर्ड देखा जा सकता है. बहुत से जवानों का अंतिम संस्कार 8 व 9 अप्रेल को हुआ क्योंकि उनके शव देर से उनके पैतृक गांव पहुंचे. दूसरे राज्यों की तो छोड़ें छग के ही रायगढ और जशपुर के शहीदों का शव भी सड़क वाहन से दो तीन दिन बाद उनके परिजनों तक पहुंच पाया. गर्मी की भीषणता से शवों की हालत को बिगड़ने लगी थी अपनों ने उन्हें जीभर के देखा भी नहीं और उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया.

यह सब कोरी बकवास नहीं है इसका सार्वजनिक सुबूत इसी से मिल जाता है राजकुमार देवांगन जिनका ताल्लुक छग सशस्त्रबल से है सपरिवार इस आयोजन का मजा लेते हुए वीडियो फुटेज में दिखाई देते इसके अलावा पुलिस के कई आला अफसर यहां मौजूद नजर आ रहे हैं यहां यह बताना जरूरी है कि ये अफसर डयूटी पे तो कतई नहीं हैं-जबकि रायपुर राजधानी है और सभी विभागों के मुखिया यहां निवासरत् होते हैं. कोई डर, कोई शर्म किसी में नहीं बची है. चालाक डीजीपी ने जायज सवाल खड़े करने वालों को बहुत पहले ही एक खेमे विशेष का प्रचारित करके अपनी जगह पहले ही सुरक्षित कर ली है. कुछ भाट और चारण भी पाल रखे हैं जो यदाकदा कोई मामला आने पर उनका प्रशस्तिगान भी करते रहते हैं. संवेदनशील पत्रकारों के सवालों से बौखलाकर मुख्यमंत्री रमन सिंह 6 अप्रेल की घटना की राजनीति न करने का हथौड़ा चलाकर उन्हें खामोश करते हैं, मगर 10 अप्रेल के तथाकथित गैरसरकारी (सरकारी) आयोजन में पूरी सरकार और पुलिस की मौजूदगी को किस कंपनी के पर्दे से ढंकेंगे?

मगर सवाल उठाएगा कौन? सवाल उठाने वालों ने भी तो अपने खेमे बांधकर निष्ठावान पड़ोसी की भूमिका अपना ली है. अब तक की सबसे बड़ी हत्यारी घटना को अंजाम देकर खुशी का जश्न सिर्फ नक्सली ही नहीं मना रहे हैं. छग सरकार, पुलिस प्रशासन, जिले की नौकरशाही और सरकारी व पुलिसिया मकहमे के सभी लग्गे भग्गों ने भी जश्न मनाया है. राज्य की अस्मिता के नाम पर ब्लाग काले करने वाले कई ब्लागर, तथा कथित साहित्यकार, लेखक ज्यादातर सपरिवार इस सरकारी (गैरसरकारी) जश्न में शरीक थे. सत्यता की पड़ताल के लिए लेखिका के पास मौजूद इस जश्न के वीडियो फुटेज देखे जा सकते हैं. कहां है राष्ट्र व धर्म के ठेकेदार? आइये जनाब यहां लाशों के सौदागरों की तरह जवानों की मौत से बेपरवाह जश्न मना रहे देशद्रोही मौजूद हैं. है किसी में हिम्मत जो ऐसे आनंदोत्सवों में खलल डाल सके?

जुलैखा जबीं (लेखिका सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार हैं.)

-- इति समाप्तम् --

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