रविवार, मई 20, 2012
   
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क्या विज्ञापनो से प्रदेश " अव्वल" बनेगा ?

                                                     " अव्वल" हिंदी का साधारण शब्द लेकिन हम सब के जीवन में खास अहमियत रखता है  हमारा सारा जीवन इस  " अव्वल" शब्द की पदवी को हासिल करने में  चला जाता है कुछ लोग इसे हासिल कर लेते है तो कुछ हसरत लिए दुनिया से चल देते है  हर मुकाम पर अपने और अपने खास लोगो को अव्वल देखने की चाह हमेशा हमारे मन में हिलोरे मारते रहती है  देश की बात करे तो कर्ज लेने में " अव्वल", नेताओ की बात करे तो झूट बोलने में " अव्वल",  जनता है तो ...गलत जनप्रतिनिधि चुनने में " अव्वल" , 
पिता की बात करे तो पुत्र को आगे देखने की चाह में " अव्वल",  नारी है तो फैशन में " अव्वल",  ब्लागर की कहे  तो कमेन्ट में  " अव्वल", प्रेमी है तो प्रमिका की नजर में  " अव्वल"  इस तरह ये कतार बहुत लम्बी है और हर कोई हर जगह " अव्वल" ही रहना चाहता है मृत्यु को छोड़ हर कोई इस दौड में अनवरत प्रयासरत है  फिर उसमे " अव्वल" होने के गुण हो या न हो पर उसकी चाह हमेश कुल्सित होते रहती है जिसके चलते हम सभी अपने संसाधनों से इसे साबित करने में कही कोई कमी नहीं करते.  अब आप ही बताइए जब हर आम आदमी ये चाहत रखता है तो ख़ास क्यों नहीं जी हा मै इस वक्त बात कर रहा हु छत्तीसगढ सरकार और आये दिन उनके लगने वाले " अव्वल" के विजापन की  जिसमे  पिछले १५ दिनों से " अव्वल"  के विजापन के साथ  मुख्यमंत्री रमन सिह  छत्तीसगढ के अखबारों में दिखाई दे रहे  है.जहा सारा विश्व मंदी से जुझ रहा हो और केंद्रीय सरकार खर्च कम करने के तरीके खोज खुद को धन बचने वाली सरकार साबित कर  " अव्वल" बनने की कवायद कर रही हो , वही छत्तीसगढ सरकार खुद को अखबारों से  " अव्वल" साबित करने में जुटी हुई है ये और बात है की सरकार " अव्वल" है की मुख्यमंत्री  की प्रदेश ? ये समझ से परे है पर  उन्होंने तो अखबारों और चैनेलो के माध्यम से खुद को " अव्वल" बताने और यह पाठ जनता को पढाने में कोई कसर  नहीं छोड़ी ....
                              जबकि बेखौप सरकारी तंत्र  इस " अव्वल" के विपरीत कार्य करते दिखाई पड़ते  है  और उन अखबारों  में लगने वाले विज्ञापनो को ध्यान से देखे  तो पायेगे की " अव्वल" से पटे इन सभी अखबारों के उसी पेज में जहा  " अव्वल"  सरकारी बखान कर रहा है  उसी पेज में  उसके ठीक ऊपर इस बखान की पोल खोलते राज्य के समाचार लगे है . अगर आपको विश्वाश न तो उन सभी अखबरों को ध्यान से देखिये " ग्राम पंचायतो  तक वायमैक्स आधारित स्टेट वाइड एरिया नेटवर्क बनाने में एशिया में अग्रणी ' इस सरकारी बखान के ठीक ऊपर लगा है '  महगाई के खिलाफ राज्य भर में कर्मियों ने निकली रैली " इस तरह एक  और अखबार में " अव्वल" का सरकारी बखान " राष्ट्रिय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजन क्रियान्वयन में देश में अग्रणी "  छपा है वही ऊपर में प्रादेशिक समयस्य प्राथमिकता से  प्रकाशित है तो इस तरह " अव्वल" के सारे सरकारी बखान के ऊपर या उस दिन के अख़बार में कोई एक पेज ऐसा नहीं है जहा सरकार के " अव्वल" के बखान के की पोल ना खुलती हो और  " अव्वल", के सरकारी बखान का समर्थन करती हो पर ये दुर्भाग्य ही है.  सडको की जगह गढढो में  " अव्वल" , आम व्यक्ति से दुरिया बनाने में " अव्वल" , कमजोर प्रशाशनिक तंत्र में " अव्वल",  नक्सलवाद समस्या  ना सुलझा पाने में  " अव्वल" , बिजली और अनाज बाँट गुमराह करने में " अव्वल"  युवाओ को छोड़ रिटायर्ड सेवानिवृत अधिकारियो को एअक्स्टेन्सन देने में " अव्वल",  सूचना के अधिकार के दुरुपयोग करने में  " अव्वल", खर्च करने में" अव्वल" , चंदा उगाहने में भाजपा " अव्वल", नई राजधानी के लिए नये ग्राहक जुटाने में " अव्वल",  प्रादेशिक समस्याओ में  " अव्वल" केंद्र में प्रदेश का सही प्रतिनिधित्व ना  कर पाने में  " अव्वल", प्रधानमंत्री सड़क योजन का पैसा खाने में " अव्वल",  घटिया ट्रांसफार्मर घोटाले में " अव्वल", भ्रष्टाचार और भ्रष्ट अधिकारियो की बहाली में " अव्वल" , सरकार के  ऐसे बहुत से काम है जिनके आये दिन बखान इन्ही अखबारों द्वारा किया जाता है अब आप ही बताये की १५ दिन या २० दिन सरकारी  " अव्वल" के  बखान को सही माने की साल भर इन अखबारों में छपने वाले  " प्रदेश के अव्यवस्था और भ्रष्टाचार में अव्वल"  को ...............१
           बहरहाल साईरन लगी लाल बत्ती की कार में कल्प कुरता पहने  भीड़ को चीरते हुए आगे  निकलने वाले हमारे राजनेता " अव्वल" है की नहीं और ये कैसे  प्रदेश को " अव्वल" बनायेगे ये तो खोज का विषय है पर हा हम ये जरुर कह सकते है की अगर सरकार " अव्वल" बनाने और बनने के सरकारी विजापन ऐसे ही प्रकाशित करवाती रही तो सरकारी विजापन से अख़बार मालिक और पत्रकार आर्थिक रूप से जरुर " अव्वल" हो जायेगे. 
आपके विचार आमंत्रित है 
 
 
-- इति समाप्तम् --

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