बाबा बोले, वही ठीक...
छत्तीसगढ़ की संस्कृति सीधे सरल शब्दों में यह है कि जो अच्छा लगे उसे अपना लो, बुरा लगे सो जाने दो... इस संस्कृति का परिपालन यहां का हर वाशिंदा करता है और जो इस प्रदेश में सरकार चलाए वह भी इसी संस्कृति के तहत ही व्यवहार कर सकता है। संभवत: इसीलिए हाल ही एक समारोह में दो विधाओं के दिग्गजों के बीच टकराव की जगह परस्पर सम्मान का भाव प्रकट हुआ और एक विवाद उत्पन्न होने से बच गया। यदि वह स्थिति छत्तीसगढ़ के अलावा कहीं और निर्मित हुई होती तो पक्के तौर पर यह वैचारिक अवरोध दुनियाभर में चर्चित हो गया होता।
अब सीधी बात पर आएं कि छत्तीसगढ़ में राजधानी रायपुर में एक निजी स्कूल के समारोह में पधारे योगाचार्य बाबा रामदेव ने राज्य में पांचवें कुंभ के तौर पर सुस्थापित नवपरंपरा पर कटाक्ष करते हुए अपने संबोधन में कह दिया कि शाही स्नान करने से पाप नहीं धुल जाते। बाबा ने तो कहा तो ठीक। हर कोई सहमत होगा कि गंगा नहाने से अब पाप नहीं धुलते बल्कि कई चर्मरोग शरीर से जुड़ जाते हैं। हम पौराणिक मान्यताओं का सम्मान करते हुए यह मानने तैयार हैं कि गंगा स्नान से वह शरीर चाहे पवित्र न हो जिसमें आत्मा समाहित है किंतु आत्मा शुद्ध हो सकती है। असल गंदगी इससे दूर हो सकती है कि आत्मा पवित्र हो जाए तो वह परमात्मा का अंश होने का दायित्व निभा सकती है। इसी तरह वैचारिक शुद्धता सिर्फ सत्संग से ही उत्पन्न हो सकती है। बाबा रामदेव वैचारिक शुद्धता के लिए यह कहते हैं कि शाही स्नान से पाप नहीं धुल सकते तो उनका आशय यह हो सकता है कि अच्छे कर्मो से ही पाप धुल सकते हैं। अब सवाल यह उत्पन्न होता है कि कर्म अच्छे होंगे तो पाप का संचार कैसे होगा। पाप वहीं पल्लवित हो सकता है जहां कर्म खराब हों। सदाचार की शिक्षा सर्वोपरि है। बाबा एक शैक्षणिक संस्थान के समारोह में पधारे थे। जाहिर है कि वहां देश के उन नौनिहालों ने उन्हें सुना और उनके विचारों को जाना, जो आगे चलकर इस देश को सम्हालेंगे। उन्होंने यह जान लिया कि शाही स्नान से पाप नहीं धुलते। हम कहते हैं कि किसी भी स्नान से पाप नहीं धुलते। बाबा जिस जमात से आते हैं उसके बारे में कहा जाता है कि मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा! मतलब यह कि वस्त्र कोई भी पहन लिये जाएं किन्तु यदि उसके अनुकूल आचरण न हो तो भेष बदलने का कोई अर्थ नहीं होता। फिर व्यहारिक बात पर आएं तो बाबा रामदेव ने जिस संदर्भ में शाही स्नान को लेकर टिप्पणी की, उनके विचारों को लेकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो रही है क्योंकि उस समय छत्तीसगढ़ में राजिम कुंभ के समापन अवसर पर शाही स्नान का आयोजन चल रहा था। बाबा संयोग से उसी समय पधारे और उन्होंने मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की मौजूदगी में यह संबोधन दिया कि शाही स्नान से पाप नहीं धुल जाते। यदि किसी और अवसर पर बाबा ने यह बात कही होती तो इस शाश्वत सत्य को कोई अपने विश्लेषण का विषय नहीं बनाता। हम विवश है कि बाबा ने छत्तीसगढ़ में मिलने वाले सम्मान के प्रतिफल में यह क्या कह दिया? जवाब में धर्मप्राण मुख्यमंत्री ने अपने उद्बोधन में उस अवसर पर कह दिया कि स्वामी जी अपने उद्बोधन में इतना मार्ग दर्शन दे देते हैं कि उसके बाद कुछ कहने के लिए बाकी ही नहीं बचता। इसे हम रमन सिंह कि सदाशयता और सियासी चतुराई दोनों ही मान सकते हैं। पहले तो उन्होंने एक योगी का सम्मान प्रदर्शित किया। इसके साथ ही उन्होंने यह न कहते हुए भी अभिव्यक्त कर दिया कि आप को जो कहना था वह कह चुके हम इसका जवाब देना उचित नहीं समझते। गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में विधानसभा में विधेयक लाकर राजिम कुंभ की अधिकृत तौर पर सरकारी आयोजन की व्यवस्था की गई है। इसके तहत ही राजिम कुंभ में शाही स्नान होता है। यह परंपरा भारत के अति प्राचीन कुंभों में संचालित है। इस परंपरा को छत्तीसगढ़ की धरती पर आकर बाबा रामदेव ने जिस तरह कटाक्ष का विषय बनाया वह छत्तीसगढ़ की संस्कृति के अनुरूप नहीं है। किंतु तब भी छत्त्तीसगढ़ बुराइयों को छोड़ सिर्फ अच्छाइयों को गले लगाने का आदी है इसलिए यहां की जनता सिर्फ यही चाहेगी कि मीठे बोल और कड़वे प्रवचनों के बीच में कहीं भी व्यंग्य बाण चलेगा तो उसकी चुभन एक सीमा के बाद बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
लागिन फार्म

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छत्तीसगढ में कितने बाबूलाला ... मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़...
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